नीरज उत्तराखण्डी/पुरोला। जनपद देहरादून के पर्वतीय जनजाति क्षेत्र जौनसार बावर में आरक्षित श्रेणी से जुड़े छात्र-छात्रओं को मुफ्त शिक्षा व्यवस्था का लाभ दिलाने को संचालित आवासीय सुविधा वाले राजकीय आश्रम पद्धति विद्यालयों (एटीएस) में अनुसूचित जाति (एससी) के बच्चों को प्रवेश नहीं मिल पा रहा है, जिसको लेकर अभिभावकों में भारी आक्रोश है।
विद्यालय प्रशासन विभाग के उच्च अधिकारियों के आदेश का हवाला देकर एससी के बच्चों को प्रवेश देने से मना कर रहा है, जबकि विद्यालयों में 229 सीटें खाली पड़ी हैं। क्षेत्र के लोगों ने पूर्व की भांति एटीएस में एसटी और एससी दोनों वर्ग के बच्चों को दाखिला दिलाने की व्यवस्था लागू करने मांग की है, जिससे गरीब परिवार के बच्चों को शिक्षा मिल सके।

गौरतलब है कि देहरादून जनपद से जुड़े जनजातीय क्षेत्र जौनसार बाबर के त्यूणी, विनोन और हरिपुर में तीन जगह बालक वर्ग के लिए राजकीय आश्रम पद्धति विद्यालय संचालित हो रहे हैं। वहीं बालिका वर्ग के लिए एटीएस लाखामंडल और एटीएस लागापोखरी में राजकीय आश्रम पद्धति विद्यालय खोले गए हैं।
एटीएस बिनसोन में कक्षा 1 से लेकर 5वीं तक के बच्चों के लिए कुल 175 सीटें स्वीकृत हैं। इसके सापेक्ष यहां 109 बच्चे अध्यनरत हैं और 66 सीटें खाली हैं। इसी तरह कक्षा 6 से 10 तक के बच्चों के लिए एटीएस त्यूणी में कुल सीटें 175 स्वीकृत हैं। इसके सापेक्ष यहां 105 छात्र अध्यनरत हैं और 70 सीटें खाली रह गई हैं।
इस प्रकार एटीएस लाखामंडल में कक्षा 6 से 10वीं तक की बालिकाओं के लिए कुल 105 सीटें स्वीकृत हैं। इसके सापेक्ष यहां 92 छात्राएं अध्यनरत हैं और 93 सीटें खाली हैं। एटीएस हरिपुर में स्वीकृत कुल 175 सीटें आरक्षित श्रेणी के छात्राओं से भरी हुई है। एटीएस लागापोखरी में कक्षा 1 से लेकर 10वीं तक की बालिकाओं के लिए स्वीकृत कुल 300 सीटें आरक्षित श्रेणी की छात्राओं से भरी हुई है। एटीएस हरिपुर और लागापोखरी को छोड़ क्षेत्र के तीन अन्य राजकीय आश्रम पद्धति विद्यालयों में कुल 229 चोटें खाली पड़ी है, जिसे भरने के लिए इन दिनों प्रवेश प्रक्रिया चल रही है। वर्तमान में अभिभावक अपने बच्चे को दाखिला दिलाने के लिए त्यूणी व लाखामंडल एटीएस पहुँच रहे हैं, लेकिन उन्हें प्रवेश नहीं मिला। एटीएस में अनुसूचित जनजाति के बच्चों के अलावा अनुसूचित जाति के छात्र-छात्राओं को प्रवेश देने से विद्यालय प्रशासन ने मना कर दिया। ऐसे में अभिभावकों को निराश होकर वापस लौटना पड़ रहा है।
एटीएस स्कूलों में प्रवेश न मिलने पर भारत संवैधानिक अधिकार संरक्षण मंच के राष्ट्रीय संयोजक दौलत कुंवर, भाजपा कंवासी मंडल की उपध्यक्ष बचना शर्मा और युवा मोर्चा के ओम प्रकाश समेत अन्य लोगों ने कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि पूर्व में उत्तर प्रदेश के समय से राज्य गठन के बाद तक एटीएस विद्यालय में अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति दोनों वर्ग के बच्चों को प्रवेश देने को व्यवस्था संचालित थी। राज्य गठन के कुछ वर्षों बाद एटीएस में नई व्यवस्था लगू कर दी गई, जिसमें अनुसूचित जाति के बच्चों को प्रवेश देने से मना कर दिया गया। ग्रामीण अभिभावकों के विरोध जताने पर वर्ष 2016 में फिर से पुरानी व्यवस्था लागू कर दी गई। इस बार फिर से नए नियम लागू कर एटीएस में खाली पड़ी सीटों को भरने के लिए एससी के बच्चों को प्रदेश नहीं दिया जा रहा।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने कहा कि सरकार ने गरीब परिवार से जुड़े आरक्षित श्रेणी के बच्चों को एटीएस विद्यालय में सभी जगह मुफ्त शिक्षा, गहने ठहरने एवं खाने की आवासीय सुविधा जूते कपड़े आदि की व्यवस्था सरकारी खर्च पर की है। क्षेत्रवासियों ने पूर्व की भांति बच्चों को दाखिला दिलाने की व्यवस्था लागू करने की मांग की। पर्वतीय जनजाति क्षेत्र जौनसार बाबर में संचालित राजकीय आश्रम पद्धति विद्यालयों में अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों को प्रवेश न दिए जाने पर अभिभावकों में भारी आक्रोश है। एक ओर सरकार समाज के शोषण व वंचित वर्गों की शिक्षा के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर जनजाति क्षेत्र जौनसार बावर में खुले आश्रम पद्धति आवासीय विद्यालयों में अनुसूचित जाति के बच्चों के प्रवेश पर प्रतिबंध का शासनादेश जारी कर देश के भविष्य जरूरतमंद नौनिहालों को शिक्षा के अधिकार से वंचित कर रही है। ऐसे में अभिभावक अपने बच्चों के प्रवेश के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। विद्यालय के सूचना बोर्ड पर चस्पा सूचना के मुताबिक महालेखाकार की आडिट आपत्ति रिपोर्ट का हवाला देकर जारी शासनादेश आश्रम पद्धति विद्यालय में अनुसूचित जाति के बच्चों के प्रवेश न दिए जाने का कारण बताया जा रहा है। उक्त शासनादेश ने जनजाति क्षेत्र में खुले आश्रम पद्धति आवासीय विद्यालयों में अनुसूचित जाति के बच्चों के प्रवेश पर प्रतिबंध के तुगलगी फरमान से अनुसूचित जाति के नौनिहाल शिक्षा अधिकार से वंचित हो रहे हैं। जिसको लेकर अभिभावकों में भारी निराशा है और उन्होंने इसको लेकर आंदोलन की चेतावनी दी है। बतातें चले कि आर्थिक एवं सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के शैक्षिक भविष्य को तराशने के लिए ऐसे आश्रम पद्धति वाले विद्यालयों की स्थापना की गई थी। ये विद्यालय शिक्षा की बेहतर गुणवत्ता के लिए पहचाने जाते हैं। यही कारण है कि क्षेत्रवासियों की ये संस्थान पहली पसंद हैं।

