देहरादून। उत्तराखंड की धामी सरकार द्वारा बड़े शोर-शराबे के साथ लाए गए धर्मांतरण विरोधी कानून की सच्चाई अब अदालतों के फैसलों के बाद पूरी तरह उजागर हो चुकी है। सरकार ने जिस कानून को “सख्त” और “ऐतिहासिक” बताकर जनता के बीच डर और भ्रम का माहौल बनाया वह पूरी तरह खोखला साबित हुआ है।
इस पर धामी सरकार को घेरते हुए उत्तराखंड कांग्रेस नेत्री गरिमा मेहरा दसौनी ने कहा कि सरकारी आंकड़े ही इस बात की गवाही दे रहे हैं कि अब तक दर्ज 62 मामलों में से मात्र 5 मामले ही पूर्ण सुनवाई तक पहुंचे और इन सभी पांच मामलों में आरोपियों को अदालत ने बरी कर दिया। यह तथ्य धामी सरकार के ढुलमुल रवैये, कमजोर जांच और गैर-जिम्मेदाराना कानून व्यवस्था को स्पष्ट रूप से उजागर करता है।
उन्होंने कहा कि अगर वाकई उत्तराखंड में जबरन या संगठित धर्मांतरण जैसी कोई गंभीर समस्या थी, तो फिर एक भी मामला साबित क्यों नहीं हो पाया? क्या पुलिस और अभियोजन को जानबूझकर कमजोर रखा गया या फिर यह पूरा कानून केवल सांप्रदायिक तुष्टिकरण और राजनीतिक ध्रुवीकरण का औजार था?
दसौनी ने आरोप लगाते हुए कहा कि धामी सरकार ने इस कानून का इस्तेमाल न्याय सुनिश्चित करने के लिए नहीं, बल्कि समाज को बांटने, एक वर्ग विशेष को डराने और चुनावी लाभ लेने के लिए किया। नतीजा यह हुआ कि कानून का सम्मान भी नहीं बचा और न्याय व्यवस्था पर भी अनावश्यक दबाव डाला गया।
उन्होंने कहा कि धामी सरकार जनता को बताए जब एक भी दोष सिद्ध नहीं हुआ तो इस कानून का औचित्य क्या था?
कमजोर मामलों और फर्जी प्रचार के लिए जिम्मेदारी कौन लेगा?
क्या उत्तराखंड को प्रयोगशाला बनाकर सांप्रदायिक राजनीति की जा रही है?
गरिमा ने कहा कि उत्तराखंड की जनता अब सच समझ चुकी है।
धामी सरकार का धर्मांतरण कानून कानून कम, राजनीतिक तमाशा ज़्यादा साबित हुआ है।


