दून विनर/देहरादून।
भारत में हिमालय से निकलकर बंगाल की खाड़ी में समुद्र में समाने से पहले गंगा नदी यहाँ की करोड़ों की आबादी के दैनिक व्यक्तिगत, सामूहिक और व्यावसायिक कार्यों के लिए जलापूर्ति करती है किन्तु वास्तव में उत्तराखंड के कुछ हिस्से को छोड़कर नदी का पानी पीने लायक कतई नहीं है।
उत्तर प्रदेश के ज्यादातर भाग में गंगा के पानी से सिंचाई का कार्य करना भी मुश्किल है। देश ही नहीं बल्कि दुनिया की अति महत्वपूर्ण और विशिष्ट नदी गंगा की सफाई के लिए वृहद रूप में परियोजनाओं को आरम्भ किए हुए चार दशकों का समय हो रहा है किन्तु गंंगा आज भी बहुत ज्यादा प्रदूषित है। हरिद्वार से आगे गंगा का पानी इतना प्रदूषित रहता है कि इसमें स्नान करना रोगों को आमंत्रित करने जैसा है। हमारी उस नदी का ये हाल हो गया है जो हमारे लिए गंगा माँ है, जिसमें स्नान करने हर साल करोड़ों लोग आते हैं, जिसके तट पर कुंभ जैसे अति विशाल मेले लगते हैं जिसमें दुनिया के देशों से भी लोग शामिल होते हैं। हम जिसे पवित्रतम मानते हैं, उसी को स्वच्छ बनाए रखने की कोशिश नहीं करते। पूजा-पाठ, हवन की बची हुई सामग्री भी नदी में बहाने में संकोच नहीं करते। घर में रहते हैं तो कूड़ा-कचरा निस्तारण के लिए नदी में मिलने वाले नालों को गंदा करने से नहीं चूकते। नदी किनारे स्थित होटल, व्यावसायिक काम्पलैक्स, मठ-आश्रम अपशिष्टों का उपचार नहीं करते। इस पर धन खर्च करने से वे परहेज करते हैं। और हमारी सरकारें इससे चार कदम आगे हैं। नगर निकाय देश के शहरों और कस्बों में रोज पैदा होने वाले कूड़े-कचरे, मल-मूत्र मिले जल, बाजारों के अपशिष्ट, कारखानों से निकलने वाले विषैले रसायनों का निरापद रूप में प्रबंधन नहीं कर पा रहे हैं। उनके पास वैज्ञानिक चेतना, उत्तरदायित्व की भावना और मांग के अनुसार संसाधनों की काफी कमी है। राज्य और केन्द्र की सरकारें योजनाओं के बाद योजनाओं को बढ़ाती हैं। हर बार सरकारों को नेतृत्व देने वाले दावा करते हैं कि गंगा नदी को स्वच्छ बनाने में उनकी सरकार को बड़ी सफलता मिली है। गंगा की सफाई के नाम पर गीत रचे जाते हैं, वीडियो प्रसारित होते हैं, चलचित्र निर्मित किए जाते हैं, सेमिनार आयोजित होते हैं, मोटा साहित्य बाँटा जाता है, विशेष अतिथियों को स्मृति चिन्ह दिए जाते हैं, अखबारों-टीवी, सोशल मीडिया में समाचार आते हैं लेकिन फिर गंगा के पानी की गुणवत्त का परीक्षण होने पर रिपोर्ट आती है कि गंगा का पानी अधिकांश जगहों पर मनुष्यों के पीने और नहाने लायक तो दूर, पशुओं को नहलाने लायक भी नहीं रहा। दो-दो, तीन-तीन साल में गुणवत्त की प्रगति को बताती ऐसी रिपोर्ट आतीं रहती हैं। भारत सरकार वर्ष 2008 में गंगा नदी को राष्ट्रीय नदी का दर्जा दे चुकी है और इलाहाबाद व हल्दिया के बीच के गंंगा नदी जल मार्ग को राष्ट्रीय जल मार्ग घोषित कर चुकी है मगर इससे अधिक फर्क गंगा के प्रदूषण पर नहीं पड़ा है। राज्य हो या केन्द्र की सरकार, दोनों के पास नियम-कानूनों को लागू करवाने का तंत्र और ताकत है परन्तु उनसे न्यायालयों और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा समय-समय पर गंगा की स्वच्छता से जुड़े मामलों में दिए गए निर्देशों का पालन करवाने में ही पसीने छूट रहे हैं। जो ढ़ाँचा और व्यवस्था चाहिए अभी तक उसका निर्माण नहीं हो सका है।
सोचनीय बात है कि उत्तराखंड से लेकर बंगाल तक गंगा की सहायक नदियों और सीधे गंगा में मिलने वाले गंदे नालों में से कितनों को नदियों में मिलने से पहले गंदे जल का शोधन करने के लिए स्थापित किए जाने वाले संयंत्रों में शोधित किया जा रहा है। समय और धन के आकार को देखें तो आज तक गंगा को साफ रखने के लिए कोई लंबा इंतजाम हो जाना चाहिए था किन्तु ऐसा नहीं हो पाया है। वर्ष 1985 में पहली बार पहला गंगा एक्शन प्लान बनाया गया था जिसे केन्द्र सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने शुरू किया। यह योजना 15 साल चली और इस पर 901 करोड़ रुपए खर्च हुए। गंगा एक्शन प्लान-दो वर्ष 1995 में शुरू कर इसे 1996 में राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना में समाहित करने के बाद वर्ष 2011 में राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा नदी मिशन से उच्चीकृत किया गया और 1995 से वर्ष 2014 तक इस परियोजना में 4168 करोड़ खर्च हुए। गंगा फिर भी मैली ही रही। वर्ष 2014 में नई केन्द्र सरकार ने गंगा को निर्मल और अविरल बनाने के उद्देश्य से नमामी गंगे नामक राष्ट्रीय फ्लैगशिप कार्यक्रम शुरू किया। यह कार्यक्रम ही इन दिनों गंगा नदी की स्वच्छता के लिए चल रहा है। इसके लिए 40-50 हजार करोड़ का विशाल बजट घोषित है अभी तक 20 हजार करोड़ आवंटित किए जा चुके हैं। लेकिन गंगा, यमुना, गोमती, दामोदर, महानंदा नदियों की साफ-सफाई और उन्हें प्रदूषण मुक्त कर स्वच्छ नदी बनाने के कार्य में मिली सफलता का अंदाज गंगा नदी के किनारे पानी को हाथ में लेकर लगाना ज्यादा मुश्किल कार्य नहीं हैँ। इस तरह तो लगता है कि अभी कई साल और कई योजनाओं की जरूरत पड़ेगी जब हमारी प्रमुख नदियों को प्रदूषण से मुक्ति मिल पाएगी। जाहिर है इसका अधिकांश दारोमदार हमारी आने वाली पीढ़ी पर होगा जिन्हें उनके पूर्वज साफ नदियाँ देने से असफल साबित हो रहे हैं।


