देहरादून। भाजपा ने नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य के पूर्व विधायक बेटे के चुनाव नहीं लड़ने को हार के डर से कांग्रेसियों के मैदान छोड़ने की शुरुआत बताया है। प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने कहा, उनका एक परिवार, एक टिकट’ की बात महज बहाना है, जबकि वे भी ये सच जान गए हैं कि कांग्रेसी परिवारों का कोई भी सदस्य नहीं जीतने वाला है।
मीडिया द्वारा पूछे सवाल पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता यशपाल आर्य के बेटे और पूर्व विधायक संजीव आर्य द्वारा आगामी विधानसभा चुनाव न लड़ने की घोषणा बताती है कि हार स्पष्ट देखकर, कांग्रेस नेताओं ने मैदान छोड़ना शुरू कर दिया है। कांग्रेस अब पूरी तरह से हताशा और निराशा के दौर से गुजर रही है, लिहाजा कांग्रेस नेताओं द्वारा ‘एक परिवार, एक टिकट’ की बातें करना पूरी तरह खोखला और बेमानी है।
आज उत्तराखंड की जागरूक जनता की राय को यशपाल आर्य भली-भांति जान गए हैं कि प्रदेश में कांग्रेस का कोई भी परिवार अब चुनाव जीतने की स्थिति में नहीं है। चाहे उस परिवार से एक सदस्य चुनाव लड़े या उससे अधिक, जनता उन्हें पूरी तरह नकारने का मन बना चुकी है। यही वजह है कि अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती देख, साख बचाने के लिए कांग्रेस इस तरह के खोखले सिद्धांतों का ढोंग रच रही है।
उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा, सच तो यह है कि उनके बेटे संजीव आर्य अपने पूरे राजनीतिक जीवन में केवल 2017 का चुनाव ही जीत पाए थे, और वह भी इसलिए क्योंकि उस वक्त वे भाजपा के सिंबल और प्रचंड लहर के सहारे मैदान में थे। ऐसे में कांग्रेस के टिकट पर जीतना उनके लिए संभव ही नहीं है। वहीं तंज कसते हुए कहा कि आर्य ने इस फैसले के जरिए अपनी ही पार्टी के भीतर एक तीर से दो निशाने साधने की कोशिश की है। पहला निशाना यह कि उन्होंने अपने बेटे संजीव आर्य को आगामी चुनाव में मिलने वाली लगातार दूसरी करारी हार और उससे होने वाली घोर राजनीतिक शर्मिंदगी से सुरक्षित बचा लिया है। दूसरा उन्होंने ‘त्याग’ का मुखौटा पहनकर अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेता व पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत तथा अन्य वरिष्ठ दिग्गजों के सामने बड़ी मुसीबत खड़ी करने की कोशिश की है। इस तरह उन्होंने उन सभी कांग्रेसी दिग्गजों की राह में बाधा डाल दी है जो अपने-अपने परिवारों के लिए टिकट प्रेम में डूबे हुए हैं और अपनों को चुनावी मैदान में उतारने के लिए आतुर हैं।
उन्होंने दावा किया, कांग्रेस की अंदरूनी कलह, गुटबाजी और नेताओं का चुनाव लड़ने से पीछे हटना स्पष्ट करता है कि वे चुनाव से पहले ही हार मान चुकी है। उत्तराखंड की देवतुल्य जनता विकासपरक राजनीति के साथ है और कांग्रेस के इस तरह के पैंतरों को भली-भांति समझती है।

