मामचन्द शाह/देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में बीते पखवाड़े दो खबरों ने काफी सुर्खियां बटोरीं। पहली खबर समाज में नकारात्मक रूप से देखी गई, जबकि दूसरी खबर ने सकारात्मकता का जो उदाहरण पेश किया, वह काबिले तारीफ है।
यहां बात की जा रही है उत्तरकाशी जिले के डुंडा ब्लॉक स्थित भराण गांव में गंगा दशहरा के अवसर पर आयोजित पारंपरिक धार्मिक यात्रा का, जिसमें सामाजिक भेदभाव के आरोपों के कारण विवाद उत्पन्न हो गया था। हालांकि बाद में जागरूक लोगों के हस्तक्षेप के कारण मामले को सुलटा लिया गया, लेकिन तब तक समाज के एक वर्ग की काफी किरकिरी हो चुकी थी और उत्तरकाशी से लेकर अस्थायी राजधानी तक के गलियारों में यह खबर चर्चा का विषय बनी रही कि आखिर समाज में आज भी निम्न वर्ग के लोगों को इस तरह के भेदभाव का शिकार क्यों होना पड़ रहा है?
बता दें कि उत्तरकाशी जिले के डुंडा ब्लॉक स्थित भराण गांव में गंगा दशहरा का अवसर था। जहां पारंपरिक धार्मिक यात्रा गांव के आराध्य देव सोमेश्वर देवता की देव डोली को गंगोत्री धाम ले जाए जाने की सदियों पुरानी परंपरा है। इसी दौरान अनुसूचति जाति समाज के लोगों ने उनके साथ भेदभाव करने का आरोप लगाया।
बताया गया कि इस धार्मिक यात्रा में गांव के सभी वर्ग की भागीदारी रही है। ग्रामीणों के अनुसार आयोजन के लिए प्रत्येक परिवार से लगभग चार सौ रुपये सहयोग राशि ली जा रही थी। आरोप है कि जब अनु. जाति वर्ग के लोग सहयोग राशि देने पहुंचे तो कुछ लोगों ने उनसे राशि लेने से इंकार कर दिया और कहा कि वे मुख्य यात्रा का हिस्सा नहीं बन सकते तथा अपनी डोली अलग से लेकर जाएं। इस पर अनु. जाति वर्ग में आक्रोश फैल गया। नाराज ग्रामीण न्यायिक सहायता लेने के लिए जिला मुख्यालय उत्तरकाशी पहुंचे और अधिवक्ताओं से मुलाकात कर कानूनी कार्रवाई की मांग की। ग्रामीणों का कहना है कि धार्मिक आयोजनों में इस प्रकार का व्यवहार संविधान प्रदत्त समानता के अधिकार और सामाजिक न्याय की भावना के विपरीत है।
न्यायालय परिसर पहुंचे मनोज कुमार, गोरख लाल, चमन लाल, चौत लाल, विशु लाल, जीत लाल, लक्ष्मी लाल, प्यारे लाल, नत्थी लाल और चतर लाल ने बताया कि आधुनिक समाज में भी इस तरह का जातीय भेदभाव बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है। उनका कहना था कि देवभूमि उत्तराखंड अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए जानी जाती है, लेकिन कुछ लोग सामाजिक विभाजन पैदा कर इस विरासत को कमजोर कर रहे हैं।
ग्रामीणों ने बताया कि 25 मई को देव डोली को गंगोत्री यात्रा में शामिल करने को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ, जिसके बाद गांव में तनाव का माहौल बन गया। स्थिति को देखते हुए पंचायत भी बुलाई गई, जिसमें भविष्य में सार्वजनिक और धार्मिक आयोजनों में सभी ग्रामीणों की समान भागीदारी सुनिश्चित करने पर चर्चा हुई।
उत्तराखंड अनुसूचित आयोग ने इस प्रकरण का स्वतः संज्ञान ले लिया। आयोग की सदस्य सुनीता देवी के अनुसार आयोग ने उत्तरकाशी के पुलिस अधीक्षक से पूरे घटनाक्रम की विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। आयोग यह जानना चाहता है कि घटना किन परिस्थितियों में हुई और प्रशासन ने अब तक क्या कार्रवाई की है?
आयोग ने मामले को गंभीर बताते हुए निष्पक्ष जांच के निर्देश दिए हैं। आयोग की ओर से कहा गया है कि यदि जांच में किसी भी स्तर पर सामाजिक भेदभाव या संविधान प्रदत्त अधिकारों के उबंधन की पुष्टि होती है तो आवश्यक कार्रवाई की संस्तुति की जाएगी। साथ ही प्रशासन को भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने के निर्देश भी दिए गए हैं।
ग्रामीण विशन सिंह राणा ने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और किसी भी प्रकार का जातीय भेदभाव स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। गांव में भाईचारा और सौहार्द बनाए रखने के लिए सभी पक्षों को मिलकर समाधान निकालना होगा। एसोसिएशन के कुछ अधिवक्ताओं और स्थानीय लोगों ने हस्तक्षेप कर दोनों पक्षों के बीच बातचीत के बाद तत्काल स्थिति को शांत कराया गया और लोगों को समझाकर वापस भेजा गया।
‘समरसता भोज’ की चहुं ओर प्रशंसा
वहीं दूसरी ओर टिहरी जनपद के भिलंगना ब्लॉक के हड़ियाणा तल्ला गांव में सामाजिक समरसता, भाईचारे और मानवता की ऐसी प्रेरणाप्रद खबर आई है कि हर कोई उसकी तारीफ कर रह है। यहां वर्षों से समाज में जड़ें जमा चुकी छुआछूत और जातिगत भेदभाव की मानसिकता को चुनौती देने का काम किया। इंद्रमणि बडोनी स्मृति मंच के तत्वावधान में आयोजित समरसता भोज में विभिन्न वर्गों, समुदायों और सामाजिक पृष्ठभूमि के लोगों ने एक साथ बैठकर भोजन ग्रहण किया और समानता, सद्भाव तथा सामाजिक एकता का संदेश दिया।
इस दौरान महामंडलेश्वर स्वामी यतिनरसिंहानंद सरस्वती ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि समाज को जोड़ने वाले ऐसे आयोजन समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जब सभी वर्गों के लोग एक पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं तो यह केवल भोज नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का उत्सव बन जाता है। यह आयोजन समाज को यह संदेश देता है कि इंसान की पहचान उसकी मानवता से होती है, न कि जाति या वर्ग से।
उन्होंने कहा कि छुआछूत जैसी कुप्रथाएं समाज की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा हैं। यदि समाज को मजबूत और संगठित बनाना है तो ऐसी संकीर्ण सोच को जड़ से समाप्त करना होगा। उन्होंने कहा, ‘हम सुधरेंगे तो समाज सुधरेगा। सामाजिक बुराइयों को दूर करने की जिम्मेदारी केवल सरकार या संस्थाओं की नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की है।’
इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि अस्पृश्यता सनातन संस्कृति और मानवता दोनों पर एक कलंक है। इसे समाप्त करने के लिए समाज के सभी वर्गों को मिलकर आगे आना होगा। जाति, वर्ग और ऊंच-नीच के आधार पर समाज को बांटने से केवल विभाजन और कमजोरियां पैदा होती हैं, जबकि समाज की वास्तविक शक्ति उसकी एकता, प्रेम और आपसी सम्मान में निहित होती है।
समरसता भोज के दौरान गांव का वातावरण सामाजिक सौहार्द और भाईचारे की भावना से सराबोर रहा। बच्चों, युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों ने बढ़-चढ़कर भागीदारी की। उपस्थित लोगों ने इस पहल को समाज में सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए ऐसे आयोजनों को नियमित रूप से आयोजित करने की आवश्यकता पर बल दिया। आयोजक रमेश उनियाल कहते हैं कि इंद्रमणि बडोनी स्मृति मंच का उद्देश्य समाज में समानता, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत करना है। समरसता भोज इसी उद्देश्य की एक कड़ी है, जिससे लोगों के बीच संवाद, विश्वास और अपनत्व की भावना को बढ़ावा मिलता है।
कार्यक्रम में उत्तराखंड की लोक संस्कृति के प्रख्यात हस्ताक्षर और ‘गढ़रत्न’ से सम्मानित नरेंद्र सिंह नेगी की उपस्थिति ने आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की। नेगी ने अपने संबोधन में कहा कि उत्तराखंड की संस्कृति सदियों से भाईचारे, सहयोग और सामुदायिक जीवन की रही है। समाज को आगे बढ़ाने के लिए जातीय भेदभाव जैसी संकीर्ण सोच से ऊपर उठना समय की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि गांवों में इस प्रकार के आयोजन सामाजिक एकता को मजबूत करने के साथ-साथ नई पीढ़ी को सकारात्मक संदेश देते हैं। उनके अनुसार, जब समाज के लोग एक साथ बैठते हैं, संवाद करते हैं और भोजन साझा करते हैं, तब वास्तविक सामाजिक समरसता का निर्माण होता है। इस दौरान विभिन्न क्षेत्रों से आए सामाजिक कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों और ग्रामीणों ने भी भागीदारी की।
उन्होंने कहा कि आधुनिक भारत की प्रगति तभी संभव है, जब समाज के सभी वर्ग समान अवसर और सम्मान के साथ आगे बढ़ें। सामाजिक विभाजन की दीवारों को तोड़कर ही एक मजबूत और समृद्ध समाज का निर्माण किया जा सकता है। इस अवसर पर अबल सिंह बिष्ट, सोहनलाल खंडेलवाल, डॉ. पुरोहित, डॉ. सुशील कोटनाला, डॉ. नरेंद्र डंगवाल, डॉ. उम्मेद सिंह नेगी, डॉ. जगदीश शाह सहित अनेक गणमान्य नागरिक और क्षेत्रवासी मौजूद रहे।

