उत्तराखंड: दून शहर की कई बस्तियों में पेयजल की किल्लत

उत्तराखंड: दून शहर की कई बस्तियों में पेयजल की किल्लत

देहरादून शहर की आबादी में हर साल होने वाली बढ़ोतरी के अनुरूप पेयजल की मांग भी बढ़ रही है, ऐसे में माग के मुताबिक पेयजल की आपूर्ति को बनाए रखने के लिए नई पेयजल परियोजनाओं को शुरू करने के साथ सावधानी पूर्वक भू जल दोहन के नियमित आंकलन की जरूरत है।

दून विनर संवाददाता/देहरादून। रिहायश के लिए देश भर में पसंदीदा शहरों में शुमार देहरादून शहर में बढ़ती आबादी के दबाव और उजड़ते बाग-बगीचों, कटते पेड़ों की वजह से पानी की मांग और आपूर्ति को संतुलित बनाए रखना बड़ी चुनौती है। हालिया सालों में जलस्रोतों में गर्मियों में डिस्चार्ज में कमी से पेयजल का संकट और गहराने लगा है। उपभोक्ताओं का कहना है कि विभाग पानी की समय से निर्वाध आपूर्ति की बात करता तो है लेकिन हर बार गर्मियों में पानी के लिए दिक्कत आती है।

इस बार शहर के कम से कम नौ वार्डों की कई कॉलोनियां में पानी को लेकर दिक्कतें आ रही हैं। प्रभावित लोगों ने पेयजल की आपूर्ति को नियमित और प्रेशर के साथ करने के लिए विभाग के स्थानीय कार्यालयों में अधिकारियों को ज्ञापन सौंपे। बिजली की आंखमिचौली की वजह से भी नलकूपों को नियमित चलाने और ओवरहेड टैंकों को भरने में दिक्कतें आई हैं। इस सबका असर शहर में पानी की आपूर्ति को गड़बड़ा रहा है और लोग हैरान परेशान होकर जल संस्थान, जल निगम के चक्कर काट रहे हैं।

याद रहे कि दून शहर में सात पेयजल योजनाओं से 13.76 लाख आबादी को 247.88 एमएलडी पानी की आपूर्ति की जाती है, जबकि शहर में मांग 267.04 एमएलडी है। इसलिए पानी की आपूर्ति में कहीं न कहीं कमी बनी रहती है। इस बार तापमान बढ़ते ही शहर के रेस्ट कैंप, दून विहार, किशननगर, कांवली, कारगी चौक, डीएल रोड, इंदिरापुरम वार्ड, आर्यनगर की कई बस्तियों में पेयजल संकट गहराया है। ऋषि विहार, हरबंशवाला, अंबीवाला, ठाकुरपुर क्षेत्रों में दो-दो सप्ताह तक पानी की आपूर्ति पूरी तरह गड़बड़ा जाने पर लोगों को भारी परेशानी हुई।

बांदल स्रोत से डिस्चार्ज में कमी से बढ़ी परेशानी 

शहर के लिए पेयजल आपूर्ति के एक प्रमुख स्रोत बांदल का गर्मी में पानी का डिस्चार्ज कम हो गया। जल संस्थान के दक्षिण डिवीजन और उत्तर डिवीजन के अपर जोन में बड़े हिस्से को पेयजल सप्लाई देने वाला बांदल स्रोत का डिस्चार्ज जगातार घट रहा है। बांदल स्रोत के डिस्चार्ज के लगातार घटने से इस स्त्रोत पर निर्भर हजारों की आबादी के लिए पेयजल की आपूर्ति के मामले में चिंता की बात है। जल संस्थान ने इस स्थिति से निपटने के लिए सप्लाई का समय कम कर दिया है।

पानी की आपूर्ति कहीं सुबह तो कहीं शाम को कर पेयजल आपूर्ति संकट को टालने का प्रयास किया जा रहा है। पानी की आपूर्ति में कमी का असर शहर के करनपुर, नेशविला रोड, डोभालवाला, अधोईवाला में दिखाई दे रहा है। यही नहीं बांदल में डिस्चार्ज में कमी का अप्रत्यक्ष असर लक्ष्मण चौक, भंडारी बाग, पलटन बाजार, लूनिया मोहल्ला और चकराता रोड में भी पड़ा है। राजपुर स्थित शहंशाही और मसूरी की तलहटी के ग्लोगी स्रोत पर भी गर्मी के बढ़ने से असर पड़ा जिससे करनपुर, डोभालवाला और नेशविला रोड और अधोईवाला के ट्यूबवेलों दबाव बढ़ा है।

बिजली की आंख मिचौली से नलकूपों को चलाने और ओवरहेड टैंकों को भरने में भी दिक्कतें आई हैं। शहर में आपूर्ति की कमी, लो प्रेशर से प्रभावित क्षेत्रों की बात करें तो डीएल रोड, राजेश रावत कॉलोनी, डालनवाला, चंदर रोड, नेगी रोड, खुड़बुड़ा मोहल्ला, चुक्खु मोहल्ला, गुरु नानक एंक्लेव, कांवली रोड, रेसकोर्स, चंदर नगर, न्यू रोड, ईनामुल्लाबिल्डिंग गांधीरोड, नेशविला रोड आदि प्रभावित हैं। उधर मेंहूवाला क्लस्टर पेयजल योजना के अंतर्गत लगाए गए बिलिंग कैम्पों में अव्यवस्थाओं, बिल वितरण में लापरवाही और जन सुविधाओं के अभाव को लेकर लोगों में नाराजगी है।

स्थानीय उपभोक्ताओं ने पेयजल निगम की विश्व बैंक इकाई की अधिशासी अभियंता को इस संबंध में ज्ञापन भी दिया है। उपभोक्ताओं का कहना है कि बिल जमा करने की अंतिम तिथि के नजदीक होने तक आधे उपभोक्ताओं को बिल ही नहीं दिए गए। इससे उपभोक्ताओं को परेशानी से जूझना पड़ रहा है।

शहर की आबादी की पेयजल मांग को पूरा करना बड़ी चुनौती

एक तरफ पानी के स्रोतों के डिस्चार्ज में कमी की वजह से पेयजल की आपूर्ति और मांग में काफी अंतर आ रहा है, वहीं दूसरी ओर शहर की आबादी में बढ़ोतरी के अनुपात में पानी की आपूर्ति की मात्रा में बढ़ोतरी नहीं हो पाई। राज्य में अभी-अभी भवन गणना सम्पन्न हुई। जनगणना निदेशालय द्वारा जारी किए गए भवन गणना के आंकड़ों से पता चला है कि राज्य की जनसंख्या 1 करोड़ 27 लाख के पार पहुंच चुकी है। जबकि 2011 में उत्तराखंड की कुल आबादी 1 करोड़ 1 लाख के करीब थी। इस तरह 15 वर्षों में राज्य की आबादी में करीब 28 प्रतिशत की इजाफा हुआ। इसी तरह 15 सालों में परिवारों की संख्या में 40 प्रतिशत और मकानों की संख्या में 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। राज्य में इस दौरान लगभग 11.2 लाख नए मकानों का निर्माण हुआ। इसके कारण जहां रियल एस्टेट सेक्टर में उछाल आया वहीं बुनियादी ढांचे पर खासा दबाव बढ़ा है। बिजली पानी की आपूर्ति में मांग के अनुपात में कमी है। देहरादून शहर में भी डेढ़ दशक में जनसंख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है। मकानों की संख्या भी बढ़ी है। ऐसे में पानी की मांग में काफी इजाफा हुआ है।

पेयजल की मांग के मुकाबले आपूर्ति में कमी से कई कॉलोनियों में पानी का संकट बढ़ा है। इस समस्या पर पाने के लिए पानी के प्राकृक्तिक स्रोतों के संरक्षण के साथ भू जल के दोहन को सीमित करना होगा। इसके साथ ही पानी की बर्बादी पर कड़ा नियंत्रण जरूरी है।

महंगे पेयजल कनेक्शन का किया विरोध

लोगों को पेयजल के कनेक्शन मंहगे मिल रहे हैं। देहरादून में लोग इसका विरोध कर रहे हैं। खासकर वर्ल्ड बैंक मेहूंवाला पेयजल योजना को लेकर काफी शिकायतें आ रही हैं। उत्तराखंड पहाड़ी महासभा की महासचिव गीता बिष्ट ने एमडी जल निगम को पत्र लिखकर बताया है कि मेहूंवाला में पेयजल कनेक्शन का खर्चा 22 हजार रुपए तक आ रहा है जबकि यही कनेक्शन जलजीवन मिशन में फ्री लगाया जा रहा है। उनकी मांग है कि जल निगम, जल संस्थान से लेकर जलजीवन मिशन में एक ही रेट पर पानी के कनेक्शन जारी किए जाएं। उत्तराखंड पहाड़ी महासभा का कहना है कि पेयजल उपभोक्ताओं पर शासन के आदेश के बाद भी मैकेनिकल मीटर के स्थान पर ऑटोमेटिक वाटर मीटर का भार डाला जा रहा है। ऑटामेटिक वाटर मीटर के साथ फिक्स्ड चार्ज का बोझ उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। उधर सचिव पेयजल रणवीर सिंह चौहान कह रहे हैं कि नई योजनाओं पर पानी के मीटर अब ऑटोमेटिक के स्थान पर मैकेनिकल लगाए जाने हैं। ये सभी डिविजनों को साफकर दिया गया है।

राज्य में तीन सौ जलस्रोतों में पानी का सुखाड़ या कमी आई

नीति आयोग अपनी रिपोर्ट में पहले ही यह खुलासा कर चुका है कि उत्तराखंड में करीब 300 प्राकृतिक जलस्रोत और नदियां या तो पूरी तरह सूख चुकी हैं या सूखने के कगार पर हैं। जो नदियां और धारे कभी बारहमासी हुआ करते थे, वे अब सिर्फ मानसून तक सिमटकर रह गए हैं।

उत्तराखंड जल संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में 500 पेयजल योजनाएं ऐसी हैं जिनके स्रोत में पानी का स्तर 10 से 90 प्रतिशत तक गिर चुका है, यानी नल तो लगे हैं, लेकिन उनमें लक्ष्य के अनुरूप पानी नहीं आता।

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड के प्राकृतिक जलस्रोतों के जल स्तर में साठ फीसदी कमी आई है। राज्य में 461 जल स्रोत ऐसे हैं, जिनमें 76 प्रतिशत से अधिक पानी सूख चुका है। दिनोंदिन बढ़ती इस गंभीर स्थिति पर नीति आयोग कह चुका है कि हिमालय क्षेत्र के राज्यों में 60 फीसद से अधिक जल स्रोत सूख गए हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़ों में भी बताया गया है कि देश के 700 जिलों में 256 ऐसे हैं, जहां भूजल का स्तर अतिशोषित हो चुका है।

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