कांग्रेस को हार का अहसास है, चुनाव व्यवस्था को संदिग्ध बनाने का षड्यंत्र : भट्ट

कांग्रेस को हार का अहसास है, चुनाव व्यवस्था को संदिग्ध बनाने का षड्यंत्र : भट्ट

* मोदी सरकार ने चुनाव आयुक्तों के चयन को लोकतांत्रिक बनाया, नेता प्रतिपक्ष को दिया स्थान : भट्ट

देहरादून। भाजपा ने चुनाव आयोग और एसआईआर के मुद्दे पर कांग्रेस को उसके 60 वर्षों के शासनकाल का आईना दिखाते हुए तीखा हमला किया है। प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने कहा, असली चुनावी मैच फिक्सिंग वो थी जब जानबूझकर चुनाव आयुक्त के चयन की कभी कोई नीति नहीं बनाई गई, जब सरकारों ने हमेशा अपने यस मेन को सीट पर बैठाया, जब आयुक्तों को मंत्री बनाया, चुनाव लड़ाया।

दरअसल कांग्रेस और विपक्ष को अहसास हो गया है कि वो सामान्य तरीके से जीत नहीं सकते, इसलिए पूरी चुनाव व्यवस्था को ही संदिग्ध बनाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है।

उन्होंने पार्टी मुख्यालय में मीडिया से बातचीत में कहा कि देश में आपातकाल लागू कर लोकतंत्र की हत्या करने वाली कांग्रेस का चुनाव आयोग की चिंता करना बेमानी है। हकीकत यह है कि जब-जब कांग्रेस चुनाव हारने लगती है, तब-तब वह देश की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं और संवैधानिक संस्थाओं को संदिग्ध बनाने का षड्यंत्र रचती है।

उन्होंने निशाना साधा कि कांग्रेस के 60 सालों के शासन में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए कोई वैधानिक नीति या पारदर्शी प्रक्रिया नहीं थी। कांग्रेस सरकारें अपनी सुविधा और पक्षपातपूर्ण रवैये के आधार पर सीधे अपने मनपसंद लोगों को चुनाव आयुक्त नियुक्त कर देती थीं। इसके ठीक विपरीत, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने चुनाव आयुक्तों के चयन की प्रक्रिया को पूर्णतः लोकतांत्रिक और पारदर्शी बनाया। आज इस चयन समिति में विपक्ष के नेता को भी शामिल किया गया है, जिससे संवैधानिक संस्था की साख और निष्पक्षता मजबूत हुई है।

​भाजपा ने कांग्रेस के दौर के चुनाव आयोग से जुड़े कई गंभीर मामलों का उल्लेख करते हुए कहा किे इतिहास गवाह है कि जब तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने एक साथी चुनाव आयुक्त नवीन चावला के खिलाफ संगीन आरोपों को लेकर राष्ट्रपति से शिकायत की थी। आरोप थे कि वे चुनाव आयोग की गोपनीय बैठकों के एजेंडे कांग्रेस नेतृत्व को लीक कर रहे थे। राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री को हटाने के निर्देश देने के बावजूद तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की।इतना ही नहीं, कांग्रेस के दौर में चुनाव आयोग में रहे दो प्रमुख आयुक्त टी. एन. शेषन और एम. एस. गिल को बाद में कांग्रेस ने सक्रिय राजनीति में उतारा। शेषन ने कांग्रेस के टिकट पर लालकृष्ण आडवाणी जी के खिलाफ चुनाव लड़ा, तो एम. एस. गिल को कांग्रेस ने केंद्र में मंत्री तक बनाया। अनेकों पूर्व चुनाव आयुक्तों को कांग्रेस ने सेवानिवृत्ति के बाद राज्यपाल बनाकर उनके पक्षपाती सहयोग का ‘इनाम’ दिया।
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वहीं, इतिहास के पन्नों को पलटते हुए कहा कि यदि कांग्रेस ने वोट चोरी न की होती, तो पंडित जवाहरलाल नेहरू कभी कांग्रेस अध्यक्ष और बाद में देश के प्रधानमंत्री न बनते। इतना ही नहीं, यदि 1971 में वोट चोरी न हुई होती तो इंदिरा गांधी उसी समय अयोग्य साबित हो जातीं और दोबारा प्रधानमंत्री नहीं बनतीं। कांग्रेस का पूरा इतिहास ही जनादेश की चोरी पर टिका हुआ है।

​उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस पार्टी को अब यह भली-भांति अहसास हो गया है कि वह जनता के दिल को जीतकर चुनाव नहीं जीत सकती। इसलिए वह पूरी चुनावी व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल खड़े करके जनता के मन में संशय पैदा करना चाहती है। अपनी संभावित हार से बौखलाकर कांग्रेस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त करने का कुत्सित प्रयास कर रही है, जिसे देश और उत्तराखंड की जनता कभी स्वीकार नहीं करेगी।

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