राज्य के विशाल हिस्से में फैला वन क्षेत्र पर्यावरण, जैव विविधता और वनसंपदा की दृष्टि से जहां खासा लाभप्रद है वहीं बड़ी संख्या में वनाग्नि की हर साल हो रही घटनाओं को नियंत्रण में लाकर नुकसान को न्यूनतम करने की चुनौती भी उतनी ही बड़ी है।
दून विनर/देहरादून। उत्तराखंड में फायर सीजन खत्म होने में अभी दो सप्ताह बचे हैं। अप्रैल और मई के अंतिम दिनों में बारिश व ओले गिरने के दो संक्षिप्त दौर को छोड़ इस बार प्रचंड गरमी और नमी की कमी के चलते जंगलों में भड़की आग वन्य जीवन पर कहर बनकर टूटी है। अभी तक जंगलों में भीषण आग के चलते 407 हेक्टेयर से भी ज्यादा वन क्षेत्र स्वाहा हुआ। आग की चपेट में आने से दो लोगों की जान गई है।

वनाग्नि की दर्ज घटनाओं से पता चल रहा है कि पौड़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़, टिहरी, देहरादून, नैनीताल व उत्तरकाशी जिले विकराल बनाग्नि की दृष्टि से अधिक संवेदनशील बनकर उभरे हैं। कई वनाग्नि मामलों में वन विभाग ने एसडीआरएफ, सैन्य बल और यहां तक कि फायर ब्रिगेड की मदद के जरिए घंटों की कड़ी मशक्कत के बाद वनाग्नि पर काबू पाने में कामयाबी पाई लेकिन जंगलों की आग से वन्य संपदा और पयर्यावरण के नुकसान का आकार काफी ज्यादा है। इस साल फायर सीजन में हर दिन औसतन 4 हेक्टेयर जंगल आग की भेंट चढ़े हैं। वनाग्नि की वजह से वन संपदा को हो रही बड़ी क्षति के साथ ही जंगल के समीप की बस्तियों में भी नुकसान हुआ है। त्यूणी की देवधार रेंज में लगी आग के फैलाव की वजह से 12 से अधिक किसानों के करीब साढ़े छह हेक्टेयर क्षेत्र में फैले सेब के लगभग दो हजार फलदार पेड़ों के जलकर राख होने की खबर आई है, यही नहीं चार ग्रामीणों की आवासीय छानियां भी जलकर राख हुई।
गौरतलब है कि 53,483 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले उत्तराखंड का 71 प्रतिशत हिस्सा बनों के अंतर्गत है, लेकिन बढ़ते तापमान, कम होती चारिश और सूखती जमीन जैसे कारण अब जंगलों पर भारी पड़ रहे हैं। इस साल राज्य के आठ जिलों में वनाग्नि की ज्यादातर घटनाएं दर्ज हुई हैं। इन जिलों में विस्तारित चीड़ के वनों में जमा होने वाली सूखी पत्ती ‘पिरुल’ वनाग्नि को विकराल बनाने में आग में घी का काम कर रही है। पहाड़ी ढलानों और तेज हया के कारण आग कुछ ही समय में बड़े क्षेत्र को अपने आगोश में ले रही है। है। पहाड़
अल्मोड़ा, नैनीताल और पौड़ी जिलों में आबादी के करीब फैले धने चीड़ के वन खतरे को और बढ़ा रहे हैं जबकि उत्तरकाशी और टिहरी में कम वर्षा और बढ़ता तापमान जंगलों को सूखा बना रहा है। पिथौरागढ़ के जंगलों में भी आग की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसके साथ ही जहां वनों में आग सतह पह ही अपना असर दिखाती है, वहां जैवविविधता पर संकट गहराने के साथ ही वन्यजीवों की जान पर बन आती है। आग की वजह से जलस्रोत सूखने से दिक्कतें बढ़ रही हैं। जंगलों से उठ रहे धुएं के गुबार से वन्य जीव संकट में आ रहे हैं और आसपास की बस्तियों में भी हवा में प्रदूषण बढ़ने और धुंध से परेशानी बढ़ रही है। वन विभाग की टीम ने कुछ जगहों पर जंगलों में आग लगाने के आरोप में गिरफ्तारियां की हैं। वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं के बीच वन विभाग ने कहा है कि जंगल की आग बुझाने में सहयोग न करने वालों पर मामला दर्ज होगा। बदरीनाथ-केदारनाथ के डीएफओ एसके दुबे के मुताबिक वन उपज लेने वाले, लकड़ी काटने की अनुमति लेने वाले, मवेशी चराने वाले और वन क्षेत्र के आस पास रहने वाले लोग इसके दायरे में आएंगे।
वन विभाग के डेटा के अनुसार उत्तराखंड में इस साल 15 फरवरी से 30 मई तक वनाग्नि की कुल 481 घटनाएं दर्ज हुई, जिनमें 407 हेक्टेयर से भी ज्यादा वन क्षेत्र खाक में मिला। इस तरह एक दिन में औसतन लगभग 4 हेक्टेयर वन क्षेत्र को वनाग्नि ने अपनी चपेट में लेकर बबर्बाद किया है। कुल दर्ज वनाग्नि की इन घटनाओं में से 282 आरक्षित वन क्षेत्र और 199 सिविल सोयम या वन पंचायत क्षेत्र की हैं। जबकि वनाग्नि की वजह से खाक हुए वन क्षेत्र में 243 हेक्टेयर से ज्यादा संरक्षित वन क्षेत्र में और 164 हेक्टेयर के करीब सिविल सोयम या वन पंचायत क्षेत्र के अंतर्गत है। गढ़वाल मंडल में वनाग्नि से प्रभावित वन क्षेत्र कुमाऊं मंडल के बनिस्बत साढ़े चार गुना है, वहीं बनाग्नि की दर्ज घटनाएं भी गढ़वाल मंडल में कुमाऊं के मुकाबले चार गुना से ज्यादा हैं। मैदानी क्षेत्र के जिलों में देहरादून में सबसे अधिक हेक्टेयर जंगल जले हैं।
धू-धू कर जलते जंगलों ने बढ़ाई परेशानी
उत्तरकाशी जिले में मई में बाड़ाहाट रेंज के बसुंगा, मैणागाड व गोपियारा क्षेत्र में और डुंडा रेंज के बड़ेधी व खरवां गांव से लगे जंगलों में भीषण आग लगी। मुखेम रेंज के मनेरा बाईपास से लगे पोखरी गांव के जंगलों में आग का तांडव दिखा। मुखेम रेंज में सिविल क्षेत्र में वनाग्नि में आवासीय भवन भी आग की चपेट में आने से बाल-बाल बचा। उत्तरकाशी जिले में ही यमुना घाटी में दिल्ली-यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग-507 के सुमन क्यारी और नैनबाग के सामने यमुना पार क्षेत्र में लुधेरा, सरयाना और मुंशी गांवों के आसपास के जंगल धू-धू कर जलते रहे। इसके साथ ही अगलाड़ घाटी में भी भेडियाना गांव के समीप जंगल आग की चपेट में आ गए। लगातार बढ़ रही वनाग्नि की घटनाओं के कारण पूरे क्षेत्र में धुआं और धुंध छा गई, जिससे दृश्यता भी प्रभावित हुई। वन विभाग ने एसडीआरएफकी मदद से काफी मशक्कत के बाद बड़ी मुश्किल से इन आग की घटनाओं को काबू में किया। पौड़ी जिले के यमकेश्वर में ताल रेंज के तिमली गांव और आसपास के जंगल भी 24 मई की दोपहर धधक उठे थे। उधर कुमाऊ में बागेश्वर जिले में भी जंगलों में आग लगने की घटनाओं लगातर हुई। जिले में नदीगांव के जंगल धू-धू कर जल उठे। आग की लपटें तथा धुएं के कारण आसपास के क्षेत्र में अफरा-तफरी का माहौल बना। नदीगांव के अलावा कैराली, धरमघर क्षेत्र के जंगलों में भी लगातार आग लगने की घटनाएं सामने आती रही। इसके अलावा अल्मोड़ा जिले के रानीधारा रोड के पास जंगल में आग लगी। रानीखेत काकड़ीघाट से आगे जंगल में भी आग भड़की, हालांकि समय रहते इन पर काबू पा लिया गया। जंगलों में फैल रही आग से वन संपदा के साथ-साथ जैव विविधता पर भी संकट गहराने लगा है। जानकारी मिली है कि जंगलों की भीषण आग से बचने के लिए वन्यजीव सुरक्षित स्थानों की तलाश में गांवों और शहरों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की परेशानियां बढ़ गई हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बीते कुछ दिनों में जंगली जानवरों की आवाजाही आबादी वाले क्षेत्रों में बड़ी है।
जिले वन विभाग की ओर से चेतावनी देते हुए कहा गया है कि कि यदि कोई व्यक्ति लापरवाही या जानबूझकर आग लगाते हुए पकड़ा गया तो उसके खिलाफवन अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत कठोर कार्रवाई अमल में लाई जाएगी। प्रभागीय वनाधिकारी बार-बार चेतावनी जारी करते हैं कि जंगलों को आग लगाने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाएगी, किन्तु जंगलों की आग की घटनाएं काबू में में नहीं आ रही। इस साल देहरादून जिले में बनाग्नि की घटनाओं ने सभी को सकते में डाला है। हाल ही में विकासनगर के दो गांव के जंगल, सहिया के फेडुकलानी क्षेत्र, कुलांवाला के जंगल, जौलीग्रांट में एअरपोर्ट के समीप के जंगल में आग लगने की घटनाएं दर्ज की गई। चकराता छावनी परिषद के जंगल बरोरी के समीप सड़क से नीचे भी आग लगी थी। त्यूणी क्षेत्र में आग से सेब के बगीचों को काफी नुकसान हुआ। 24 मई की शाम मसूरी के कैमल बैंक क्षेत्र में निरंकारी भवन के नीचे चीड़ के जंगल में भीषण आग लगी। करीब आधा हेक्टेयर क्षेत्र इसकी चपेट में आया। लाखों रुपए की बन संपदा जलकर खाक हो गई। करीब चार घंटे की मशकत के बाद आग पर काबू पाया गया। यही नहीं मसूरी वन प्रभाग के अंतर्गत चामासारी के समीप शेराघाट क्षेत्र के जंगल में भी भीषण आग लगी।
वनाग्नि की चपेट में आने से दो लोगों की गई जान
इस बार अब तक वनाग्नि की घटनाओं में दो व्यक्तियों की मौत हुई है और ये दोनों दुखद घटनाएं चमोली जिले में हुई। 26 मई को गैरसैंण क्षेत्र में नगली-उमकर के जंगलों में आग लगी। आग दूंगा गांव पाटीखाल तोक में 52 वर्षीय सुरेशी देवी पती मगन लाल की गोशाला तक पहुंच गई। आग बुझाने के प्रयास में महिला गंभीर रूप से घायल हो गई। अस्पताल ले जाते समय रास्ते में उनकी मौत हो गई। दूंगा के प्रधान नरेन्द्र बिष्ट और नगली के प्रधान नवीन बहुगुणा ने पीड़ित परिवार को तत्काल आर्थिक सहायत देने की मांग की है। इससे पूर्व 20 मई को चमोली जिले के बेडूबगड़ बिरही क्षेत्र में बद्रीनाथ हाईवे के समीप चीड़ के जंगल में आग लगी थी। आग बुझाने गए पाखी जलम्बाड़ निवासी फायर वाचर राजेन्द्र सिंह नेगी 42 वर्ष पुत्र नंदन सिंह नेगी झुलसकर गहरी खाई में गिर गए। पूरे रात सर्च ऑपरेशन चला।
एसडीआरएफ ने 21 मई सुबह शव को खाई से बरामद किया। स्थानीय लोगों के साथ ही जनप्रतिनिधियों ने बदरीनाथ वन प्रभाग के डीएफओ का घेराव किया। इसके बाद वन विभाग ने मृतक की पत्नी को आउटसोर्सिंग पर कुशल श्रमिक के रूप में नौकरी देने और विभित्र माध्यमों से परिजनों को 30 लाख रुपए देने का लिखित आश्वासन दिआ। इसके बाद ही परिजनों ने शव को उठाया।
इसके साथ ही 20 मई को पिपोला निवासी 50 वर्षीय अंजू देवी पत्नी स्व. जबर सिंह कीर्तिनगर के पैडूला क्षेत्र के जंगल में घास लेने गई थी। इसी दौरान पैड़ला के जंगलों में भीषण आग लग गई। बताया गया है कि आग फैलने पर महिला उसे बुझाने का प्रयास करने लगी, लेकिन अचानक तेज लपटों की चपेट में आई।
वनाग्नि नियंत्रण के लिए जन भागीदारी पर जोर
वन विभाग के अनुसार वनाग्नि नियंत्रण में जनसमुदाय की भागीदारी पर विशेष जोर दिया रहा है। ग्राम स्तर पर गठित 496 वनाग्नि प्रबंधन समितियों को 30-30 हजार रुपए की राशि दी जा रही है। जनजागरुकता के तहत राज्य में अभी तक 3500 से ज्यादा जागरूकता शिविर आयोजित किए गए। वन मंत्री सुबोध उनियाल का कहना है कि वनाग्नि रोकने के लिए जनसहयोग सबसे बड़ा हथियार है। उन्होंने बताया है कि सीजन के बाद हरेक जिले में वनाग्नि रोकथाम में अच्छा काम करने वाले वन कर्मियों, समूहों व व्यक्तियों को पुरस्कार दिए जाएंगे। पहला पुरस्कार एक लाख, दूसरा 75 लाख और तीसरा पुरस्कार 50 हजार रुपए का होगा। इस योजना का प्रस्ताव जल्दी ही शासन को भेजा जाएगा। वन मंत्री के मुताबिक पिस्ल एकत्रीकरण के लिए अब ग्रामीणों को दो के स्थान पर 10 रुपए प्रति किग्रा की दर से भुगतान हो रहा है। इस वर्ष 8555 टन पिरुल एकत्रीकरण का लक्ष्य रखा गया है। पिरुल से ब्रिकेट बनाने की इकाइयों की संख्या बढ़ाई जाएगी। वर्तमान में नौ इकाइयां संचालित हैं। पिरुल के अन्य उपयोग के दृष्टिगत केंद्र सरकार के स्तर पर भी बातचीत चल रही है। इसके अलावा 11217 वन पंचायतों में जड़ी-बूटी व सगंध खेती के दृष्टिगत 628 करोड़ का हर्बल मिशन चल रहा है।
वन मंत्री सुबोध उनियाल ने मुख्य वन संरक्षक वनाग्नि एवं आपदा प्रबंधन को जंगलों में हाइड्रेट लगाने की कार्ययोजना के तहत हाइड्रेट लगाने के निर्देश भी दिए हैं। मुख्य वन संरक्षक वनाग्नि एवं आपदा प्रबंधन सुप्तांत पटनायक के अनुसार पेयजल योजनाओं के बारे में जल संस्थान और पेयजल निगम से जानकारी ली जा रही है इसके बाद जंगलों से गुजरने बाली पेयजल लाइनों पर हाइड्रेट लगाने की कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया जाएगा।
मुख्य वन संरक्षक वनाग्नि एवं आपदा प्रबंधन सुशांत पटनायक के अनुसार अग्नि नियंत्रण के दृष्टिगत सभी संवेदनशील जिलों में निगरानी बढ़ाने, फायर वाच टावर सक्रिय करने और त्वरित प्रतिक्रिया दलों को अलर्ट मोड पर रखने के निर्देश दिए गए हैं। सुशांत पटनायक का कहना है कि पहाड़ के जंगलों में आग की घटनाएं, वहीं अधिक हैं, जहां चीड़ के चन हैं और सूखे पिरुल की परत जमा है। उन्होंने बताया कि उच्च शिखरीय वन प्रभागों में भी आग का मुख्य कारण पिरुल के वनों में जमा होने वाला अति ज्वलनशील पिरुल है। इसे देखते हुए पिरुल एकत्रीकरण का कार्य शुरू कर दिया है। उन्होंने बताया कि सूर्यास्त के बाद जंगलों में लगी आग बुझाने के लिए एनडीआरएफ एसडीआरएफके साथ ही सेना व अर्द्धसैनिक बलों की मदद लेने के निर्देश भी वन ? भागों को दिए गए हैं।

“जंगलों को आग से बचाने के लिए सरकार गंभीरता से जुटी है। इसके लिए तमाम नवाचार भी किए जा रहे हैं। जंगलों में पेयजल लाइनों पर हाइडेंट लगाने की योजना इसी कड़ी का हिस्सा है।”
– सुबोध उनियाल, वन मंत्री

