उत्तराखंड: आयुष्मान योजना फर्जीवाड़ों ने किया सरकार की नाक में दम

उत्तराखंड: आयुष्मान योजना फर्जीवाड़ों ने किया सरकार की नाक में दम

हर साल प्रति परिवार पांच लाख तक का कैशलेस इलाज उपलब्ध कराने वाली उत्तराखंड सरकार की अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना में अपात्र व्यक्तियों के फर्जीवाड़े से इलाज कराने के बढ़ते मामले और योजना से संबद्ध कई निजी अस्पतालों की लूट की कारगुजारियों से एक तरफ हर साल योजना के लिए आवंटित बजट पर अनावश्यक बोझ बढ़ रहा है, वहीं समय पर क्लेम के भुगतान न हो पाने से प्रदेश के सभी गरीब और जरूरतमंद परिवारों को इलाज मुहैया कराने में मुश्किल आने लगी है।

दून विनर/देहरादून। उत्तराखंड पलायन निवारण आयोग की रिपोर्ट सहित अनेक शोधों में बताया है कि उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में स्थित गांवों से पलायन जारी है। स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी बड़े पैमाने पर पलायन की मुख्य वजहों में है। बीमारी की हालत में ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को बड़े कस्बों या मैदानी इलाकों का रुख करना पड़ता है जो अप्रत्यक्ष तौर पर परिवारों को भी पलायन करने के लिए प्रेरित करता है। पर्वतीय कस्बों में प्रायः सुविधासम्पन्न अस्पतालों की भारी कमी है। बड़ी बिल्डिंग वाले सरकारी अस्पतालों में महंगे जांच उपकरण और डॉक्टर नहीं हैं। मर्ज के थोड़ा बढ़ने पर अस्पतालों से मरीजों को हल्द्वानी, रामनगर, काशीपुर, ऋषिकेश या देहरादून रैफर करना आम प्रकिया है। इस सारी फेरमफेरा में मरीज और उसके परिवार की अच्छी खासी फजीहत होने के साथ मोटी रकम आवागमन पर ही खर्च हो जाती है और बड़े अस्पतालों में महंगा इलाज कराने के लिए लाले पड़ने की नौबत आती है। ऐसे में मरीज को अस्पताल में भर्ती के दौरान उसके आयुष्मान कार्ड से मिलने वाली कैशलेस इलाज की राहत बड़ा सहारा सिद्ध हो रही है। राज्य सरकार द्वारा 2018 में शुरू की गई अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना के अंतर्गत प्रदेश के अतिरिक्त 18 लाख परिवारों को कैशलेस इलाज की सुविधा दी गई, जबकि केन्द्र सरकार की आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना में प्रदेश के 5 लाख परिवार आच्छादित हैं। त्रिवेन्द्र सिंह रावत की सरकार ने दोनों योजनाओं को एकीकृत कर प्रदेश के 23 लाख परिवारों को आयुष्मान आयुष्मान योजना में 23 लाख परिवारों को हर परिवार योजना में कवर किया है। इस तरह उत्तराखंड प्रतिवर्ष अधिकतम 5 लाख रुपए इलाज के लिए कैशलेस तौर पर सीधे संबंधित अस्पताल अदा करने का प्रावधान है। योजना में प्रदेश में स्थित अस्पतालों के साथ दूसरे प्रदेशों में स्थित अस्पतालों को भी सूचीबद्ध किया गया है। योजना के अंतर्गत सूचीबद्ध की सुविधा मिलेगी। अन देवाना अटल आयुष्मान उत्तराखंड की खास बात ये है कि यह योज‌ना उत्तराखंड के लगभग सभी परिवारों को स्वास्थ्य कवरेज प्रदान करती है यानी अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना उत्तराखंड की लगभग पूरी आबादी को कवर करती है। योजना कर लाभ लेने के लिए उत्तराखंड का आयुष्मान कार्ड अनिवार्य शर्त के तौर पर है। सरकार ने उत्तराखंड के नागरिकों के आयुष्मान कार्ड बनाने के लिए कई बार विशेष कैंप लगाए और जनजागरूकता बढ़ाने के लिए प्रचार-प्रसार पर खूब पैसा व्यय किया।

विडंबना ये है कि आयुष्मान योजना में उत्तराखंड के लगभग सभी परिवारों को स्वास्थ्य कवर मिल रहा है परंतु उत्तर प्रदेश या अन्य कई प्रदेशों में इसी तरह की योजनाओं में लक्षित समूहों को ही स्वास्थ्य कवरेज हासिल है। ऐसे में इसकी संभावना काफी बढ़ गई है कि दूसरे प्रदेशों के निवासी भी वैध अवैध उपायों से उत्तराखंड में आयुष्मान योजना में कार्ड हासिल कर कैशलेस इलाज की सुविधा का लाभ उठाने की कोशिश करें। जाहिर है इस परिस्थिति में चांदी काटने के लिए फर्जी कागजात बनाने वाले गिरोहों की पौ बारह होने की धीरे-धीरे वास्तविक हकदारों पीछे धकेल औचित्य को ही सवालों के घेरे में डालने पर आमादा है। इसलिए अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना के लाभके लिए कौन पात्र है, इसकी जांच का बड़ा महत्व है। जानकारी के मुताबिक अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना की पात्रता के लिए परिवारों का उत्तराखंड का निवासी होना और उनके पास वैध राशन कार्ड या परिवार रजिस्टर में प्रविष्टि होना अनिवार्य है। योजना में आयुष्मान गोल्डन कार्ड होना आवश्यक है। पात्रता के लिए व्यक्तियों या परिवारों के पास अटल सीजीएचएस अथवा ईसीएचएस के अंतर्गत आने बाले सरकारी कर्मचारी और आयकरदाता इस लाभ के लिए सरकारी या सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं। योजना के लाभार्थियों को भारी-भरकम मेडिकल बिलों में कटौती होने पर बड़ी राहत मिल रही है। लेकिन इसमें फर्जीवाड़े के कई वाकयों ने राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण उत्तराखंड के साथ ही राज्य सरकार को मुश्किल में डाल दिया है। सवाल ये है कि अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना के हर वित्तीय वर्ष के लिए आवंटित किए जाने वाले सीमित बजट में यदि दूसरे प्रदेशों के अपात्र व्यक्तियों को फजी तरीके से लाभ लेने पर रोक नहीं लगेगी और योजना से जुड़े अस्पतालों को मनमाने तरीके से रोगी का इलाज दशां कर क्लेम राशि की लूट को सख्ती से रोका नहीं जाएगा, तब एक बेहतर योजना भी आगे चलकर खटाई में पड़ सकती है। बीच में ये भी खबर आई कि अटल आयुष्मान योजना में बढ़ते बजट से चिंतित सरकार इसमें लाभार्थियों की संख्या को कम करने के लिए योजना के प्रावधानों में परिवर्तन कर सकती है। यदि ऐसा होता है तो यह प्रदेश के लाखों परिवारों के लिए बुरी खबर होगी। ओखनीय है कि प्रदेश में आयुष्मान योजना में इसकी शुरुआत से ही फर्जीवाड़े के बाकए सामने आए है। राज्य सरकार और राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण ने योजना के छिद्रों को बंद करने के लिए समय-समय पर कदम भी उठाए हैं, बावजूद आज तक फर्जीवाड़े पर विराम नहीं लगाया जा सका है।

दून अस्पताल में आयुष्मान कार्ड पर करा दिया रिश्तेदार का इलाज

दशकों से उत्तराखंड सहित पड़ोसी राज्य के समीपस्थ जिलों के लोगों को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध करा रहा दून अस्पताल अब राजकीय दून मेडिकल कॉलेज के नाम से जाना जाता है। पिछले एक दशक में अधीन है और इसे दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल के अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या बढ़ने और पैथोलॉजी में सुविधाओं के उनयन से रोज आने वाले मरीजों की संख्या भी बड़ी है। लेकिन इसके साथ अस्पताल में गड़बड़ियों के वाकए भी बड़े हैं। दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल में ताजा किरसा आयुष्मान निवासी एक व्यक्ति ने अपने आयुष्मान कार्ड पर फर्जी कार्ड में फर्जीवाड़े से इलाज कराने का है। देहरादून तरीके से उत्तर प्रदेश निवासी अपने एक रिश्तेदार की हार्ट सर्जरी करवा दी। मरीज को अस्पताल से डिस्चार्ज करने की औपचारिकताओं के दौरान ही इस फर्जीवाड़े का भेद खुल पाया। फर्जीवाड़े के मुख्य आरोपी भंडाफोड़ होने के डर से इलाज का खचर्चा चुकाने को पेशकश भी की। पता चला है कि अस्पताल प्रबंधन ने भी इलाज का खर्चा चुकाने पर मामले को रफा दफा करने में रुचि दिखाई, किन्तु आयुष्मान कमेटी द्वारा सख्ती दिखाने और मामले के मीडिया तक पहुंच जाने कानून की चौखट पर है और आजकल सार्वजनिक तौर के बाद आयुष्मान कार्ड के फर्जीवाड़े का यह मामला पर चर्चा का विषय बना हुआ है।

आरोप है कि राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल में देहरादून के गोविंदगढ़ निवासी मंजीत ने अपने आयुष्मान कार्ड पर खुद को मरीज बताते हुए 26 मई 2026 को भर्ती कराने की औपचारिकता पूरी की लेकिन वास्तव में अपने साले विकी पुत्र रवि कुमार, निवासी ओल्ड हस्तिनापुर मवाना मेरठ का इलाज कराया। 28 मई को विक्की की हार्ट सर्जरी कर तीन स्टेंट डाले गए। विकी को 30 मई को अस्पताल से डिस्चार्ज होना था। लेकिन डिस्वार्ज होने से एक दिन पहले जब मरीज के बिस्तर का फोटो मांगा तो मंजीत वहां से भाग गया। यही नहीं ऑपरेशन वाले मरीज विक्की को भी भगा दिया गया। शहर कोतवाली में इस मामले में केस दर्ज हुआ है। शहर कोतवाल हरिओम राज चौहान के मुताबिक दून अस्पताल के उप चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एसएस बिष्ट ने तहरीर दी। इसमें बताया है कि विगत 26 मई को देहरादून के गोविंदगढ़ निवासी मंजीत सिंह ने कार्डियोलॉजी विभाग में प्रोफेसर डॉ. सलिल गर्ग की देख रेख में मरीज को भर्ती कराने के लिए अपना आयुष्मान कार्ड लगाया और बायोमैट्रिक प्रक्रिया पूरी की, जबकि इलाज दूसरे व्यक्ति का कराया जा रहा था। 30 मई को अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज खंगालने पर फर्जीवाड़े की पूरी तरह पुष्टि हो गई। कड़ी पूछताछ में मंजीत ने कुबूल किया कि वह मेरठ (उप्र) निवासी अपने रिश्तेदार विकी का इलाज अपने आयुष्मान कार्ड और उसके साले विकी पर मुकदमा दर्ज हुआ है। दोनों पर करवा रहा था। इस मामले में कोतवाली में मंजीत आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 318(4), 319(2) और 61(2) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। मामले की विवेचना उपनिरीक्षक विनयता चौहान को सौपी गई है।

गौरतलब है कि दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल जैसे राजधानी देहरादून के प्रसिद्ध अस्पताल में एक व्यक्ति के आयुष्मान कार्ड पर दूसरे अपात्र व्यक्ति का इलाज होने से अस्पताल के प्रबंधन पर भी सवाल उठ रहे हैं। सवाल ये उठ रहा है कि किसी ने बिस्तर में इलाज के लिए मौजूद रहे मरीज और कागजों में दर्शाए जा रहे मरीज का मिलान क्यों नहीं किया। अटल आयुष्मान योजना में प्रदेश के अस्पतालों में ऐसे फर्जी मरीजों के मामले पहले भी आए हैं। ऐसे में इन बातों को लेकर अस्पतालों की व्यवस्था को चाक चौबंद किया जाना जरूरी था। लेकिन इस मामले में मरीज के भतीं होने पर पहले चरण में ही दस्तावेजों की सत्यता की जांच नहीं की गई। यदि कायदे से जांच हुई होती तो मामला तत्काल पकड़ में आ जाता अस्पताल के लिए यह फजीहत से कम नहीं रहा कि मरीज को आसानी से बदल दिया गया और उसका ऑपरेशन तक हो गया लेकिन किसी अधिकारी या कर्मचारी को इसकी भनक नहीं लगी। इस फाहे की पोल मरीन के बेड साइड के फोटो को मांगने पर खुली। बताया गया है कि मरीज को भी से भगा दिया गया। यही नहीं जब मामले में भेद खुलने पर फंसने की नौबत आई तो आरोपियों ने भेद खुलने पेशकश भी कर डाली, लेकिन मामले की सूचना मीडिया में पहुंच जाने और आयुष्मान कमेटी के सख्त रुख से पूरा भांडा फूट गया। इस मामले को लेकर दून अस्पताल में कई घंटे तक हंगामा चलता रहा। इस बीच मंजीत विक्री को कभी अपना साला बताता रहा तो कभी जानने वाला कहता रहा। लेकिन इस फर्जीवाड़े में साठगांठ की आशंका भी व्यक्त की जा रही है। कुछ अस्पताल के कर्मचारियों के मिलीभगत के आरोप भी लग रहे हैं। दून अस्पताल में हुए इस आयुष्मान फर्जीवाड़े में आरोपियों के साथ अस्पताल के किसी कर्मचारी की भी मिलीभगत रही या नहीं रहीं, यह जांच पूरी होने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन अभी ये तो निश्चित ही कहा जा सकता है कि अस्पताल ने इस मामले में बड़ी लापरवाही बरती है।

योजना से जुड़े निजी अस्पतालों में जांच में पाई गई भारी गड़बड़ियां

सरकारी अस्पतालों में आयुष्मान योजना से जुड़ी गड़बड़ियों से सरकार की व्यवस्था पर सीधे सवाल उठ रहे हैं। लेकिन इससे बड़ी समस्या आयुष्मान योजना से निजी क्षेत्र के अस्पतालों ने पैदा की है। मुनाफे की जुड़े चाह में आयुष्मान योजना में सूचीबद्ध निजी क्षेत्र के कई अस्पतालों ने फर्जी तरीके अपनाकर मोटी क्लेम राशि बसूली है, तय मानकों की धज्जियां उड़ाकर नियम कानूनों को ताक पर रखा है या आयुष्मान योजना में करने से पहले मरीज से जांच के नाम पर हजारों की रकम झटकी है। इन तमाम बातों का खुलासा उत्तराखंड राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण आयुष्मान कमेटी की जांच और की छापेमारी के दौरान हुआ है।

गौरतलब है कि जून 2026 में उत्तराखंड में प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना, अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना और राज्य सरकार स्वास्थ्य योजना के तहत सूचीबद्ध एक दर्जन के करीब अस्पतालों की राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण ने यकायक जांच की है। इस छापेमारी में गड़बड़ियों के सामने आने पर आधा दर्जन अस्पतालों की संबद्धता तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दी गई है। राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण के अनुसार, बरेली स्थित एसआरएमएस मेडिकल कालेज तथा देहरादून के ओजस्वी और अरिहंत अस्पतालों की संबद्धता निलंबित की गई है। प्राधिकरण ने देहरादून के बातूनी अस्पताल पर 86,250 रुपए का जुर्माना लगाया और 15 दिनों में कमियां दूर करने की चेतावनी दी। हैरत की बात है कि पावरलाइफ अस्पताल में प्राधिकरण के छापेमार दल को सामान्य वार्ड नहीं मिला। पावरलाइफ हॉस्पिटल में छह बेड का एचडीयू और आठ बेड का आइसीयू संचालित होता मिला। प्रेममुख अस्पताल में आयुष्मान के लाभार्थी से 48 हजार रुपए और अन्य मदों में 6 हजार रुपए लेने की शिकायत मिली। प्रकाशदीप अस्पताल में मरीजों से हार रुपए तक ले जाने को शिकायत मिली। सुनंदा मेडिकल सेंटर में डायलिसि लिए उपयोग होने वाला आरओ सिस्टम भी मानक यूनिट की स्थिति बेहद खराब मिली। डायलिसिस कल बट विश्राम की व्यवस्था भी नहीं थी। बैलमेड अस्पताल म रेप और जनजागरुकता सामग्री नहीं मिली। इस 140 बेड वाले अस्पताल में 100 मरीज भर्ती होने के बावजूद केवल छह आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना और सात राज्य सरकार स्वास्थ्य योजना के मरीज मिले। प्राधिकरण ने प्रकाशदीप व पावरलाइफ अस्पतालों के साथ सुनंदा मेडिकल सेंटर की डायलिसिस यूनिट की संबद्धता निलंबित करने की संस्तुति की। यही नहीं प्रेमसुख व सुनंदा अस्पताल पर आर्थिक दंड लगाने की भी संस्तुति की गई है। गड़बड़ी वाले सभी सभी अस्पतालों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।

वर्ष 2025 में भी आयुष्मान भारत योजना के तहत गंभीर अनियमितताएं सामने आने के बाद राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण ने सख्ती दिखाते हुए हरिद्वार और रुड़की के के निजी अस्पतालों काङ्गा हॉस्पिटल रुड़की और मेट्रो निलंबित कर दी थी। ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया कि हॉस्पिटल हरिद्वार की संबद्धता तत्काल प्रभाव से काढा हॉस्पिटल में सामान्य चिकित्सा के 1800 दावों में से 1619 मामलों में मरीजों को आइसीयू में भर्ती दिखाया गया, जबकि केवल 181 मामलों में ही उन्हें सामान्य वार्ड में रखा गया। यानी, कुल १० प्रतिशत सामान्य श्रेणी के मरीजों के लिहाज से असामान्य रूप से अधिक है।

जांच में यह भी सामने आया कि अस्पताल में एक सुनियोजित पैटर्न के तहत अधिकतर मरीजों को पहले 3 से 6 दिन तक आइसीयू में रखा गया और अस्पताल से डिस्चार्ज से ठीक पहले एक या दो दिन के लिए सामान्य वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। यह इसलिए किया गया, ताकि आइसीयू पैकेज के भुगतान का औचित्य सिद्ध हो सके, क्योंकि नियमों के मुताबिक मरीज को सीधे आइसीयू से छुट्टी नहीं दी जा सकती। कई सामान्य बीमारियों जैसे उल्टी, यूटीआइ और निर्जलीकरण के मामलों में भी मरीजों को अनावश्यक रूप से गंभीर दर्शाकर आइसीयू में भर्ती दिखाया गया। खास बात यह रही कि अधिकतर मरीजों के तापमान को लगातार 102 डिग्री फरिनहाइट दिखाया गया, जो डिस्यार्ज के दिन अचानक 98 डिग्री फारेनहाइट हो जाता है। इसके अलावा, मरीजों के बेड नंबर रोजाना बदलते रहे, और आइसीयू में भर्ती दर्शाए गए मरीजों की तस्वीरों में न तो मानिटर चालू थे, न ही आइबी लाइन लगी थी। अस्पताल में दाखिल मरीजों के फॉर्म में अलग-अलग परिवारों के नाम पर एक जैसे मोबाइल नंबर पाए गए, जबकि बीआइएस रिकार्ड में उनके पते और पहचान अलग थे। आश्चर्यजनक तौर पर दस्तावेजों की भाषा और लिखावट में समानता पाई गई जो फर्जीवाड़े की ओर इशारा करती है। हरिद्वार स्थित मेट्रो हॉस्पिटल की जांच में भी पता चला कि हर मरीज को 3 से 18 दिन तक आइसीयू में भर्ती दिखाया गया और बाद में छुट्टी से पहले सामान्य वार्ड में शिफ्ट किया गया। टीएमएस पोर्टल पर अपलोड किए गए दस्तावेजों से यह भी सामने आया कि कई ऐसे मरीज जो सामान्य बीमारियों से पीड़ित थे, उन्हें भी आइसीयू में भर्ती दिखाकर आइसीयू श्रेणी की अपकोडिंग की गई। प्राधिकरण के सामने अस्पताल द्वारा प्रस्तुत कई दस्तावेज धुंधले और अपठनीय भी पाए गए थे। जांच के दौरान इन अस्पतालों के कारनामों की पोल खुली तो प्राधिकरण ने उनको संबद्धता समाप्त करने के साथ वसूली की कार्रवाई की संस्तुति कर दी।

शुरू से ही योजना को भ्रष्टाचार ने नुकसान पहुंचाया

प्रदेश में 25 दिसम्बर, 2018 को ‘अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना’ के शुरू होने के बाद आयुष्मान योजना के दायरे में प्रदेश के लगभग सभी निवासियों के आ जाने के बाद सीमित साधनों वाले सरकारी अस्पतालों के साथ ही निजी क्षेत्र के अस्पतालों की भी भूमिका काफी बढ़ गई है। लेकिन सुरुआत में ही योजना से जुड़े निजी अस्पतालों ने रंग दिखाना शुरू कर दिया था। शुरुआती एक साल के भीतर आयुष्मान योजना से जुड़े देहरादून, हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर जिलों के 13 अस्पतालों में फनीवाड़े को पकड़ा गया। इन अस्पतालों को सूची से हटाने के साथ उनके क्लेम रोके गए और उन पर जुर्माना लगाया गया था। शुरू के एक-डेढ़ साल में आयुष्मान समिति की कार्रवाई में कुल मिलाकर 20 अस्पतालों में गड़बड़ी पकड़ी गई और उन्हें योजना से हटाया गया। इन अस्पतालों से 2.50 करोड़ की वसूली भी की गई। वर्ष 2019 में सहोता मल्टी स्पेशलिटी प्यूरो ट्रोमा सेंटर, काशीपुर में आयुष्मान योजना के फर्जीवाड़े ने आयुष्मान समिति की आआंखें खोल दी। काशीपुर के इस सहोता अस्पताल में कार्यरत एक स्त्री रोग विशेषज्ञ चिकित्सक के बारे में सामने आया कि वे साथ में काशीपुर के ही एलडी भट्ट राजकीय अस्पताल में संविदा पर तैनात थी। सहोता अस्पताल इन्हीं स्त्री रोग विशेषज्ञ के पति का बताया गया। सरकारी अस्पताल में सिजेरियन प्रसव से पैदा हुए नवजात शिशुओं का चिकित्सक महोदया सहोता अस्पताल के निकू वार्ड में रैफर करती। उनका रैफर का परामर्श लिखित में नहीं मौखिक होता। इस तरह मिलीभगत से सहोता अस्पताल आयुष्मान ययोजना में क्लेम लेता रहा। जब इस दुरभिसंधि का खुलासा हुआ तो अस्पताल को सूची से हटा दिया गया।

इसी तरह हरिद्वार के जीवन ज्योति हॉस्पिटल टिकमपुर, सुल्तानपुर में फर्जीवाड़े का मामला सामने आया। इस अस्पताल में एक ऐसे चिकित्सक तैनात थे जिनका खुलासा अस्पताल ने नहीं किया। पता चला कि तत्कालीन समय में वह अनडिस्क्लोज्ड चिकित्सक महोदय एक पीएचसी में तैनात थे और जीवन ज्योति हॉस्पिटल में आयुष्मान योजना के अंतर्गत भतीं ज्यादातर रैफरल मरीज उन्हों के पास होकर आए थे। तब आयुष्मान योजना में फर्जीवाड़ा बढ़ने से चिंतित सरकार ने कहा था कि योजना से संबद्ध अस्पतालों के लिए एसओपी तैयार की जा रही है। डेलीकिक ऑडिट सिस्टम लागू कर ऐसा पुख्ता तंत्र बनाया जाएगा कि कोई गड़बड़ी न होने पाए, लेकिन आयुष्मान समिति ने अगले साल पानी मई-जून 2020 के दो महीनों में अटल आयुष्मान योजना में 200 फर्जी क्लेम पकड़े। अस्पतालों से इन क्लेम को वापस लिया गया। अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना के तहत सूचीबद्ध आयुष्मान मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल, जिला ऊधम सिंह नगर का राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण ने ऑडिट किया। प्राधिकरण ने फरवरी 2022 में खुलासा किया कि अस्पताल में कैशलेस इलाज के पैथोलॉजी बिलों में 3 करोड़ 42 लाख 50 हजार रुपए का फर्जीवाड़ा पकड़ में आया है। इस अस्पताल में आयुष्मान योजना के अतिरिक्त राज्य के कर्मचारियों और पेंशनरों को भी इलाज की सुविधा दी जा रही थी। इसी तरह मई 2023 में देहरादून जिले के विकासनगर के जीवनगढ़ स्थित कालिन्दी हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर ने प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना, अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना और राज्य सरकार स्वास्थ्य योजना में 696 मरीजों के इलाज का क्लेम किया। राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण ने बाद में जांच करने पर पाया कि ये सभी क्लेम फर्जी थे। तब अस्पताल को सूची से हटाकर उसके विरुद्ध वसूली की कार्रवाई की गई। इस मामले में अस्पताल पर 1.19 करोड़ का जुर्माना लगाया गया।

गौरतलब है कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की 2018 से लेकर मार्च 2021 तक की रिपोर्ट में भी उत्तराखंड में आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत गड़बड़ी का खुलासा हुआ है। कैग ने आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के संचालन पर सवाल उठाए। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि आयुष्मान भारत के अंतर्गत सूचीबद्ध 43 अस्पतालों का f पांच अस्पतालों में निर्धारित बेड क्षमता से अधिक मरीजों का इलाज हुआ। एक ही नंबर से कई मरीजों का इलाज दिखाया गया है। मरीजों की मौत का विवरण लिए बगैर 15 लाख 35 हजार रुपए का भुगतान किया गया। कैग रिपोर्ट के मुताबिक योजना में गड़बड़ी करने वाले 53 अस्पतालों को हटाया जा चुका है और 140 करोड़ के दावे निरस्त किए गए थे।

फर्जी राशनकार्ड और उसके सहारे बने आयुष्मान कार्ड बड़ी समस्या

उत्तराखंड में आयुष्मान बोजना में लगभग सभी परिवारों को कैशलेस इलाज की सुविधा के प्रावधान का फायदा उठाने के लिए बाहरी राज्यों के लोग भी लालायित रहते हैं। इसके लिए अनेक लोग फर्जी दस्तावेज तक बनवा रहे है। पता चला है कि प्रदेश में आयुष्मान योजना से जुड़े अस्पतालों के आसपास कुछ गिरोह सक्रिय हैं, जो फर्जी दस्तावेज तैयार कराकर आयुष्मान कार्ड बनवाने में सहायता करते हैं। फर्जी दस्तावेजों के सहारे बाहरी राज्यों के मरीजों को मुफ्त चिकित्सा सुविधा मिलने से उत्तराखंड सरकार के बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों बिजनौर, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर से आने वाले लोग इस सुविधा का एक रिपोर्ट के मुताबिक विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों दुरुपयोग कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि एम्स ऋषिकेश, हल्द्वानी के मेडिकल कॉलेज, देहरादून और हरिद्वार के सरकारी अस्पतालों में इस तरह के कई मामले पकड़े जा चुके हैं जिनमें बाहरी राज्यों से आने वाले लोग फर्जी आधार कार्ड और अन्य दस्तावेजों के माध्यम से उत्तराखंड में आयुष्मान कार्ड बनवा कर फ्री इलाज की सुविधा ले रहे थे। फर्जी आयुष्मान कार्ड के माध्यम से मुफ्त इलाज कराने वाले मरीजों की संख्या बढ़ने से राज्य सरकार के बजट पर भारी बोझ पड़ रहा है। फर्जी मरीजों की बढ़ती संख्या से इस योजना का मूल उद्देश्य प्रभावित होने खतरा है, जिससे उत्तराखंड के जरूरतमंद निवासियों को नुकसान हो सकता है। उत्तर प्रदेश में आयुष्मान पोजना के तहत केवल बीपीएल परिवारों को फ्री इलाज की सुविधा मिलती है, जबकि उत्तराखंड में हर परिवार को इसका लाभ दिया जाता है। इस कारण पड़ोसी राज्यों के लोग उत्तराखंड में इलाज करवाने के लिए फर्जी दस्तावेजों का सहारा ले रहे हैं। याद रहे कि गृह विभाग की जांच रिपोर्ट के बाद जनवरी 2025 में मुख्यमंत्री धामी ने मुख्य सचिव को तुरंत प्रभाव से सत्यापन क्रिया तेज करने और सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए थे। इस संबंध में तत्कालीन मुख्य सचिव राधा रतूड़ी ने आदेश जारी किए। इसके मुताबिक आयुष्मान कार्ड के लिए आधार कार्ड के साथ राशन कार्ड भी अनिवार्य दस्तावेज बनाया गया। इसके साथ ही उन जनसेवा केंद्रों पर छापेमारी की कार्रवाई भी शुरू कर दी गई थी जहां फर्जी दस्तावेजों के आधार पर आयुष्मान कार्ड बनाए जाने की संभावना है। यहां यह जिक्र करना भी प्रासंगिक है कि उत्तराखंड में आयुष्मान योजना के तहत आयुष्मान कार्ड बनाए जाने के लिए राशन कार्ड अनिवार्य करने के बाद भी फर्जीवाड़ा नहीं रुका है।

दरअसल हजारों लोग जिनका राशन कार्ड निरस्त हो चुका है, वे आयुष्मान कार्ड के जरिए स्वास्थ्य सुविधा का लाभ ले रहे हैं। ये सच्चाई सामने आने के बाद राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण ने नई क्रिया शुरू की। प्राधिकरण ने ऐसे लोगों का आयुष्मान कार्ड निरस्त करना शुरू किया जिन लोगों का राशन कार्ड खाद्य विभाग की पोर्टल पर ऑनलाइन शो नहीं कर रहा है। राज्य में खाद्य योजना के तहत उन्नतीं परिवारों के राशन कार्ड बन सकते हैं, जिन परिवारों की सालाना आय पांच लाख रुपए से कम है। फर्जी दस्तावेजों के सहारे बने राशन कार्ड पर खाद्य विभाग ने तीन साल पहले बड़ी कार्रवाई शुरू की थी। खाद्य विभाग ने वित्तीय वर्ष 2023-24 में अभियान चलाकर करीब एक लाख लोगों के राशन कार्ड निरस्त कर दिए थे, जिनके परिवार की सालाना आय पांच लाख रुपए से अधिक थी। इसके चलते इन लोगों का नाम खाद्य विभाग को राशन कार्ड पोर्टल से हटा दिया गया था, जबकि ये लोग भी आयुष्मान कार्ड का लाभ उठा रहे थे। इसके बाद राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण ने सत्यापन की क्रिया शुरू की और जिन लोगों का राशन कार्ड ऑनलाइन नहीं दिख रहा, उनका आयुष्मान कार्ड निरस्त किया है। यह प्रकिया अभी चल रही है। सरकार का मानना है कि फर्जी राशन कार्यों के निरस्तीकरण से फर्जी आयुष्मान कार्ड भी रद्द किए जा रहे हैं, जिससे कोई अपात्र व्यक्ति उत्तराखंड में आयुष्मान योजना के तहत मिल रही फ्री इलाज की सुविधा को चुराकर प्रदेश के खजाने पर चोट न पहुंचा सके। राज्य सरकार ने इस फर्जीवाड़े को रोकने के लिए जनता से भी अपील की है। सरकार का कहना है कि जरूरतमंद लोगों तक योजना का लाभ पहुंचाने के लिए सत्यापन क्रिया को सख्त बनाना जरूरी है, साथ ही जनसेवा केंद्रों और अन्य संबंधित विभागों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए निगरानी तंत्र को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।

फर्जीवाड़े से बढ़े अतिरिक्त वित्तीय बोझ से चरमराने लगा बजट

गौरतलब है कि वर्ष 2024 के अंतिम दिनों में उत्तराखंड सरकार ने राज्य में आर्थिक रूप से सक्षम लोगों से अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना का लाभ न लेने का आग्रह करने की योजना बनाई। आयुष्मान पोजना के तहत राज्य के हरेक परिवार को प्रतिवर्ष 5 लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज उपलब्ध है, लेकिन योजना का बढ़ता बजट सरकार के लिए चिंता का विषय बन गया है। वित्त विभाग ने राज्य के सीमित संसाधनों को देखते हुए इस पर पुनर्विचार करने की सलाह दी। शुरुआती वर्षों में इस पोजना का वार्षिक बजट 100-200 करोड़ रुपए था, लेकिन धीरे-धीरे लाभार्थियों की संख्या बढ़ने के कारण यह बजट अब 600 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।

वर्ष 2026-27 के बजट में इसके लिए 600 करोड़ रुपए आवंटित किए गए। वर्ष 2025-26 में योजना के लिए 550 करोड़ रुपए का प्रावधान था। वर्तमान में योजना के अंतर्गत 306 सरकारी और 230 निजी अस्पताल सूचीबद्ध हैं। अब तक प्रदेश में 57.19 लाख आयुष्मान कार्ड बनाए जा चुके हैं और 16.19 लाख से अधिक बार मरीजों ने इसका लाभउठाया है। सरकार अब तक इस योजना के तहत करीब 3171 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। डायलिसिस, हृदय रोग, कैंसर, न्यूरो सर्जरी और नेत्र रोग जैसे गंभीर उपचार भी इस योजना के तहत किए जा रहे हैं जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को बड़ी राहत मिल रही है। सीएम धामी ने 17 जून, 2026 को एक्स पर पोस्ट किया “आपके एक बोट की ताकत का परिणाम है कि आज प्रदेश के 61 लाख से अधिक नागरिकों को अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण एवं निशुल्क स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ प्राप्त हो रहा है। जनकल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए हमारी सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि आर्थिक संसाधनों के अभाव में किसी भी परिवार का उपचार न रुके। यह केवल एक योजना नहीं, बल्कि लाखों परिवारों को स्वास्थ्य सुरक्षा का मजबूत कवच प्रदान करने का संकल्प है। “लेकिन हकीकत ये है कि योजना के बढ़ते वितीय भार से प्रदेश सरकार चिंतित होने लगी है। राज्य सरकार इस व्यवस्था में बदलाव करने पर विचार कर रही है, ताकि इसका लाभ उन्हीं लोगों तक सीमित रहे, जिन्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता है। इसके लिए जागरूकता अभियान चलाने और आर्थिक रूप से सक्षम लोगों को योजना छोड़ने के लिए प्रेरित करने की योजना बनाई गई।

केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा संयुक्त रूप से वित्त पोषित ‘आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना’ या आयुष्मान भारत योजना केन्द्र की सरकार की एक फ्लैगशिप योजना है। इसकी शुरुआत 201 2018 में हुई। मोदी मादी सरकार है कि इसके लिए कोई भी प्रीमियम या शुल्क लाभाश्री भाभी से नहीं लिया जाता है। योजना के तहत होने वाले कुल खर्च का भार केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा एक निश्चित अनुपात में उठाया जाता है। अधिकांश भारतीय राज्यों में केंद्र सरकार 60 प्रतिशत और राज्य सरकार 40 प्रतिशत वित्तपोषण करती है। उत्तर-पूर्वी राज्यों, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में केंद्र सरकार 90 प्रतिशत और राज्य सरकार 10 प्रतिशत वित्तीय भार उठाती है, जबकि केन्द्र शासित प्रदेशों में शत-प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाता है हालांकि विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों में यह अनुपात 60 अनुपात 40 का होता होता है। राज्यों की सुविधा के आधार पर फंड का प्रबंधन दो तरीकों से किया जाता है। पहला ट्रस्ट आधारित मॉडल और दूसरा बीमा आधारित मॉडल। अधिकांश राज्य सरकारों ने इस योजना के लिए अपने स्वयं के ‘राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण के अंतर्गत ‘ट्रस्ट बनाए हैं। उत्तराखंड में अभी यही मॉडल लागू है। केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा दिया गया फंड इन्हीं ट्रस्टों में जमा होता है, जिससे सीधे अस्पतालों को भुगतान किया जाता है। बीमा मांडल में राज्य और केंद्र सरकारें मिलकर बीमा कंपनी को तय प्रीमियम का भुगतान करती हैं। केन्द्र और राज्य सरकारें योजना के लिए हर साल बजट आवंटन करती है।

याद रहे कि आयुष्मान योजना के अंतर्गत आने वाले कई निजी अस्पतालों ने आरोप लगाया है कि सरकार ने उनके करोड़ों के क्लेम भुगतान नहीं किए हैं। इन अस्पतालों ने योजना से अपने हाथ खींच लिए। इसका बुरा असर आयुष्मान योजना के लाभाथियों पर देखा जा रहा है। उन्हें वक्त पर अस्पताल में भर्ती होने में दिकत हुई। यही नहीं कुछ मामलों में अपने पैसों में इलाज कराना पड़ा। सरकार द्वारा अस्पतालों को क्लेम का समय पर भुगतान न होने से मरीजों को हो रही परेशानी का मुद्दा राजनीतिक बहस का भी विषय भी बन चुका है। नवंबर 2025 में प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने बयान दिया कि उनके संज्ञान में आया है कि आयुष्मान योजना और गोल्डन कार्ड के तहत कई निजी अस्पताल इलाज करने से मना कर रहे हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने कड़ा कि उन्होंने इस बारे में जब निजी अस्पतालों से बात की तो उन्होंने बताया कि राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण उनके क्लेम का समय से भुगतान नहीं कर रहा है जो करोड़ों में है। गणेश गोदियाल ने इसे अजीब हालत कह कर सरकार से तुरंत करो समाधानपरक कार्रवाई की मांग की थी।

इभर उत्तराखंड सरकार ने आयुष्मान योजना में भ्रष्ठचार और फलोंवाड़े की संभावनाओं पर रोक के लिए हाल ही में कुछ नए कदम उठाए हैं। इसके तहत उत्तराखंड में केन्द्र की आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना और राज्य की अटल आयुष्मान बन उत्तराखंड योजना से जुड़े अस्पतालों के लिए डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था लागू करना अनिवार्य किया गया है। योजना से जुड़े अस्पतालों को 31 अगस्त तक हॉस्पिटल मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम को लागू करना अनिवार्य है। उत्तराखंड राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण की मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) आइएएस रीना जोशी 24 जून को मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को इस बारे में आदेश दिया ने है। मुख्य कार्यकारी अधिकारी रीना जोशी का कहना है कि डिजिटल रिकॉर्ड से मरीजों को सीधा लाभ मिलेगा और उनके मेडिकल रिकॉर्ड सुरक्षित रह सकेंगे। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था के लागू होने से एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में मरीजों की बीमारी संबंधी डेटा को देखा जा सकेगा जिससे मरीजों की चिकित्सा में भी सहूलियत होगी।

राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण के इस आदेश के तहत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना और उत्तराखंड अटल आयुष्मान योजना से जुड़े अस्पतालों को मरीजों के मेडिकल रिकॉर्ड को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर र उपलब्ध उपलब्ध कराना होगा। योजना से जुड़े सभी सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में हॉस्पिटल मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम के साथ स्कैन एंड शेयर सुविधा लागू करना अनिवार्य होगा। अस्पतालों में कार्यरत चिकित्सकों, स्टाफनर्स, फार्मासिस्ट को हेल्थ प्रोफेशनल आइडी के साथ सभी अस्पतालों की हैल्थ फैसिलिटी आइडी अनिवार्य है। मरीजों के मेडिकल रिकॉर्ड को भी आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन इकोसिस्टम से जोड़ना होगा।

एक सितम्बर के बाद केवल उन्हीं सम्बद्ध अस्पतालों को योजना के तहत प्रोत्साहन राशि का भुगतान किया जाएगा जिन्होंने मानकों का पालन कर लिया हो और जो अस्पताल मानकों के पालन में विफल रहता है वह योजना कसे बाहर हो जाएगा। नई व्यवस्था की अनिवार्यता के बाद माना जा रहा है कि सरकार योजना से जुड़े सभी सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों पर शिकंजा कसने जा रही है।

 

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